October 20, 2020

अनावरण न्यूज़

एक नयी सुबह का

पितृपक्ष 01 सितंबर से 17 सितंबर 2020 तक

हिंदू धर्म में वैदिक परंपरा के अनुसार अनेक रीति-रिवाज़, व्रत-त्यौहार व परंपराएं मौजूद हैं। हिंदूओं में जातक के गर्भधारण से लेकर मृत्योपरांत तक अनेक प्रकार के संस्कार किए जाते हैं। इनमें अंत्येष्टि को अंतिम संस्कार माना जाता है। लेकिन अंत्येष्टि के पश्चात भी कुछ ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें मृतक के संबंधी विशेषकर संतान को करना होता है।

श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक है। वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है लेकिन भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक पूरा पखवाड़ा श्राद्ध कर्म करने का विधान है। इसलिये अपने पूर्वज़ों को के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के इस पर्व को श्राद्ध कहते हैं।

इस साल यानि 2020 में पितृपक्ष 01 सितंबर से 17 सितंबर तक हैं। इसके तहत श्राद्धों की शुरुआत पूर्णिमा श्राद्ध – 1 सितंबर 2020 से लेकर सर्वपितृ अमावस्या – 17 सितंबर 2020 श्राद्ध कर्म किए जाएंगे।

पितृपक्ष में व्यसन और माँसाहार को पूरी तरह से वर्जित माना गया है। इस दौरान व्यक्ति को पूर्णतः पवित्र रहकर श्राद्ध करना होता है।
श्राद्ध का कार्य रात्रि में नही किया जा सकता है, इसके लिए दोपहर के बारह से एक बजे तक का समय सबसे उपयुक्त माना गया है। पितृ विसर्जन के दिन किये जाने वाले इस श्राद्ध में ऐसी मान्यता है कि गाय, कुत्ता, कौवा चींटी और देवताओं को पितृपक्ष में भोजन कराना चाहिए।

श्राद्ध करते वक्त पितरों को अर्पित करने के लिए भोजन के पाच अंश निकाले जाते है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि कुत्ता जल का, चींटी अग्नि का, कौवा वायु का, गाय पृथ्वी का और देवता आकाश का प्रतीक है, इस प्रकार से हम इन पाचों को आहार देकर हम पंच तत्वों के प्रति अपना आभार व्यक्ति करते है। इन पांच अंशो को अर्पण करने के कार्य को पञ्च बलि कहा जाता है।

पितृपक्ष का महाभारत से एक प्रसंग:-

श्राद्ध का एक प्रसंग महाभारत महाकाव्य से इस प्रकार है, कौरव-पांडवों के बीच युद्ध समाप्ति के बाद, जब सब कुछ समाप्त हो गया, दानवीर कर्ण मृत्यु के बाद स्वर्ग पहुंचे। उन्हें खाने मे सोना, चांदी और गहने भोजन के जगह परोसे गये। इस पर, उन्होंने स्वर्ग के स्वामी इंद्र से इसका कारण पूछा। इस पर, इंद्र ने कर्ण को बताया कि पूरे जीवन में उन्होंने सोने, चांदी और हीरों का ही दान किया, परंतु कभी भी अपने पूर्वजों के नाम पर कोई भोजन नहीं दान किया। कर्ण ने इसके उत्तर में कहा कि, उन्हें अपने पूर्वजों के बारे मैं कोई ज्ञान नही था, अतः वह ऐसा करने में असमर्थ रहे।
तब, इंद्र ने कर्ण को पृथ्वी पर वापस जाने के सलाह दी, जहां उन्होंने इन्हीं सोलह दिनों के दौरान भोजन दान किया तथा अपने पूर्वजों का तर्पण किया। और इस प्रकार दानवीर कर्ण पितृ ऋण से मुक्त हुए।

सर्वपितृ अमावस्या:-

पितृ पक्ष के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या के रूप में जाना जाता है। महालया अमावस्या पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। जिन व्यक्तियों को अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि की सही तारीख / दिन नहीं पता होता, वे लोग इस दिन उन्हें श्रद्धांजलि और भोजन समर्पित करके याद करते हैं। चतुर्दशी तिथि के दिन शस्त्र, विष, दुर्घटना से मृतों का श्राद्ध होता है चाहे उनकी मृत्यु किसी अन्य तिथि में हुई हो। पितरों के लिए श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिण्ड तथा दान को ही श्राद्ध कहते है।

मान्यता अनुसार सूर्य के कन्याराशि में आने पर पितर परलोक से उतर कर अपने पुत्र – पौत्रों के साथ रहने आते हैं, अतः इसे कनागत भी कहा जाता है। प्रत्येक मास की अमावस्या को पितरों की शांति के लिये पिंड दान या श्राद्ध कर्म किये जा सकते हैं, परंतु पितृपक्ष में श्राद्ध करने का महत्व अधिक माना जाता है।

पितृपक्ष में पूर्वज़ों का श्राद्ध कैसे करें?

जिस पूर्वज, पितर या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि अगर याद हो तो पितृपक्ष में पड़ने वाली उसी तिथि को ही उनका श्राद्ध करना चाहिये। यदि देहावसान की तिथि ज्ञात न हो तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध किया जा सकता है, जिसे सर्वपितृ अमावस्या को महालय अमावस्या भी कहा जाता है। समय से पहले यानि कि किसी दुर्घटना अथवा आत्मदाह आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है।

श्राद्ध तीन पीढि़यों तक करने का विधान बताया गया है। यमराज हर वर्ष श्राद्ध पक्ष में सभी जीवों को मुक्त कर देते हैं, जिससे वह अपने स्वजनों के पास जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। तीन पूर्वज में पिता को वसु के समान, रुद्र देवता को दादा के समान तथा आदित्य देवता को परदादा के समान माना जाता है। श्राद्ध के समय यही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं।

पितृपक्ष के दौरान पितृ तर्पण जरूरत करना चाहिए। पितृ पक्ष में पितरों के लिए श्रद्धा से तर्पण करने से जहां पितृों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, वहीं परिवार के सदस्यों की तरक्की का रास्ता खुलता है। साथ ही पितृ दोष का भी निवारण होता है। कहते हैं कि जिस घर में पितृ दोष लग जाता है उस घर में लड़के पैदा नहीं होते हैं, न ही उस घर में पेड़-पौधे उगते हैं और न ही कोई मांगलिक कार्य हो पाते हैं।

कोरोना के कारण गया का पितृपक्ष मेला स्थगित :-

विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला का आयोजन इस साल नहीं होगा। गया प्रशासन ने कोरोना के कारण इस बार मेला का आयोजन नहीं करने का फैसला लिया है। इसको लेकर आदेश जारी कर दिया गया है। इस मेले में कई देशों से विदेशी भी अपने पूर्वजों को पिंडदान करने आते हैं।
उल्लेखनीय है कि हर साल इस मेले का आयोजन राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की ओर से कराया जाता है। विभाग ने जनहित में पितृपक्ष मेला स्थगित करने का फैसला लिया है।

Recent Posts

%d bloggers like this: