September 26, 2020

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लद्दाख मुद्दे पर पहली बार खुलकर बोले एस जयशंकर, बताया- 1962 के बाद सबसे गंभीर स्थिति

नई दिल्‍ली:- लद्दाख में लंबे समय से चीन और भारत के बीच चल रहे तनाव को सुलझाने के लिए दोनों देशों के अधिकारियों के बीच कई दौर की बैठक हो चुकी है, लेकिन मामला फिर भी सुलझता हुआ दिखाई नहीं पड़ रहा है। चीन बातचीत के बाद भी विवादित जगहों से पीछे नहीं हट रहा है। जिसके बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पहली बार माना है कि पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ गतिरोध निश्चित रूप से 1962 के बाद सबसे गंभीर स्थिति है।

विदेश मंत्री डॉक्‍टर एस जयशंकर ने एक वेबसाइट को दिए इंटरव्‍यू में कहा, “यह निश्चित रूप से 1962 के बाद की यह सबसे गंभीर स्थिति है। वास्तव में 45 वर्षों के बाद इस सीमा पर हमारे सैन्य हताहत हुए हैं। वर्तमान में एलएसी पर दोनों पक्षों द्वारा तैनात बलों की मात्रा भी अभूतपूर्व है।”

भारत और चीन ने कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक बैठकें की हैं, जिसमें केवल पूर्वी लद्दाख के कुछ हिस्सों में वापसी हुई है। भारतीय और चीनी सेना मई से तनावपूर्ण स्थिति में हैं। 15 जून को लद्दाख में गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ घातक युद्ध में 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। चीन से तनाव कम करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हफ्तों तक बातचीत हुई।

विदेश मंत्री ने कहा कि भारत ने चीन को स्पष्ट रूप से बता दिया है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति दोनों पड़ोसियों के बीच संबंधों का आधार है। जयशंकर ने कहा, ‘अगर हम पिछले तीन दशकों में देखें तो यह काफी हद तक स्पष्ट है। भारतीय और चीनी सेनाएं पूर्वी लद्दाख में तीन साढ़े महीने से अधिक राजनयिक और सैन्य वार्ता के बावजूद तनावपूर्ण स्थिति में हैं।’

उन्होंने कहा कि अतीत में सीमा की स्थितियों को कूटनीति के माध्यम से हल किया गया था। यदि आप पिछले एक दशक में पीछे मुड़कर देखें तो कई बार सीमावर्ती इलाकों देपसांग, चुमार और डोकलाम में स्थितियां बिगड़ी हैं, लेकिन निश्‍चित रूप से हर बार यह अलग थी। लेकिन इनमें आम बात यह है कि सीमावर्ती सभी स्थितियों को कूटनीति के माध्यम से हल किया गया था।

विदेश मंत्री ने कहा कि चीन के साथ गतिरोध का समाधान सभी समझौतों और समझ को सम्मानित करने पर आधारित होना चाहिए, यथास्थिति को बदलने की कोशिश किए बिना। जैसा कि आप जानते हैं, हम सैन्य चैनलों और राजनयिक दोनों के माध्यम से चीनी से बात कर रहे हैं। वास्तव में वे मिलकर काम करते हैं।

भारत और चीन अपनी 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा पर सहमत नहीं हो पाए हैं, जो पश्चिमी क्षेत्र में लद्दाख के बर्फ से लेकर पूर्व में घने जंगल और पहाड़ों तक है।

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