September 25, 2020

अनावरण न्यूज़

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कालापानी पर दावा जताने वाला नेपाल छांगरू और टिंकर के बाशिंदों को रसद मुहैया कराने में विफल, लोगों में आक्रोश

नक्शे का मुद्दा ठंडा पड़ते ही नेपाल ने इन्हें बिसराया, राशन, अस्पताल और स्कूल से महरूम

जुलाई में नेपाल सरकार ने दिया था 200 क्विंटल चावल लेकिन नमक, दाल और तेल नहीं मिला

धारचूला (पिथौरागढ़):- भारतीय क्षेत्र के लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी पर दावा जताने वाली नेपाल सरकार अपने सीमांत गांवों छांगरू और टिंकर के बाशिंदों को राशन नहीं पहुंचा पा रही है। इसे लेकर छांगरू और टिंकर के लोगों में नेपाल सरकार के खिलाफ इन दिनों तीखा आक्रोश है।
व्यास गांव पालिका -1, छांगरू के जगत प्रताप ऐतवाल बताते हैं कि जुलाई में सरकार ने छांगरू और टिंकर गांवों में करीब 200 क्विंटल रसद सामग्री भिजवाई थी। उस समय नेपाल सरकार के खाद्य प्रबंधन और ट्रेडिंग कंपनी ने अनुबंध के माध्यम से छांगरू में 117 और टिंकर में 70 घरों में रसद भिजवाई गई। यहां के परिवारों को करीब एक-एक क्विंटल चावल मिला। नेपाल सरकार ने हेलीकॉप्टर द्वारा गांव तक चावल पहुंचाया लेकिन सरकार ने यह नहीं देखा कि नमक, तेल और दालों को भी छांगरू और टिंकर तक पहुंचाया जाए। उनका कहना है कि जब तक सरकार ने कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा का नया नक्शा नहीं जारी किया, तब तक इन गांवों को बहुत ही संजीदगी के साथ याद किया। भारत ने भी नवी, गुंजी और कुटी गांवों के नागरिकों की स्थिति को समझने की कोशिश की लेकिन यहां के लोगों का कहना है कि नक्शों का मुद्दा ठंडा पड़ते ही नेपाल सरकार छांगरू और टिंकर को भूल गई है। व्यास के युवा सूरज ऐतवाल कहते हैं, ” जब भी कालापानी का मुद्दा उठाया जाता है, नेपाल सरकार छांगरू और टिंकर गांवों के नागरिकों को याद करती है, लेकिन सरकार बारिश के बाद से सीमा पर पहरा दे रहे लोगों की हालत पर गौर नहीं करती कि वे क्या खा रहे हैं और कैसे रह रहे हैं? जगदीश प्रताप सितवाल कहते हैं, “इससे पहले भी नेताओं को विश्वास हो गया है कि यह स्थान बदल जाएगा लेकिन 12 साल बाद, दार्चुला-टिंकर रोड कहां पहुंच गया है? नेताओं के झूठे आश्वासन अब से नहीं हैं, वे अतीत से ऐसे ही मिलते रहे हैं। अबतक भी वे व्यास नगर पालिका के वार्ड नंबर-एक छांगरू टिंकर तक पहुंचने के लिए अपनी जमीन पर मिट्टी की सड़क नहीं बना पाए हैं। यहां सड़क नहीं है, भोजन, चिकित्सालय और स्कूल नहीं है। अच्छी दवा कहां से लें?” स्थानीय युवा सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश बोहरा का कहना है कि अब तो भगवान पर भी भरोसा नहीं रहा है। हम स्पष्ट रूप से बात नहीं कर सकते लेकिन आंखें सब सच्चाई बयां कर देती हैं। आप सरकार को अपनी समस्या नहीं बता सकते लेकिन हमारी आंखें सच बताती हैं। वह कहते हैं, “जब कालापानी का मुद्दा उठता है और काठमांडू की सड़कों पर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ती है, तब हमारे छांगरू टिंकर के नागरिक अधिक परेशानी में पड़ जाते हैं।” लॉकडाउन के कारण भारत के साथ सीमा बंद है। चिकित्सा, भोजन और परिवहन को लोग तरस रहे हैं। छांगरू टिंकर के निवासी बोहरा के अनुसार जब काठमांडू में कालापानी का मुद्दा बढ़ता है, तो हम सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उन्होंने मांग की कि जो लोग काठमांडू में राष्ट्रवाद दिखाते हैं, उन्हें अपनी जमीनी स्तर पर एक बार छांगरू टिंकर आना चाहिए। गीता बोहरा सवालिया लहजे में कहती हैं, “चावल पहुंचाने के बाद सरकार ने व्यास की बात सुनी? जनकपुरी में हेलीकॉप्टर की व्यवस्था है, हमने सुना था कि दाल, नमक और तेल पहुंचाया जाता है लेकिन गुम सरकार कहां है? हम लोग हैं या नहीं, हमें क्या सुविधाएं मिली हैं?” बोहरा ने कहा, “छांगरू टिंकर के नागरिकों से नेपाल की अपनी सरकार ने यह नहीं पूछा कि वे कैसे रह रहे हैं? कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर नेपाल सरकार की ओर से सीमांत क्षेत्रों में हेलीकॉप्टरों से दौरे किए गए और कहा गया कि हमने नक्शा जारी कर दिया है लेकिन सरकार उसी हेलीकॉप्टर से अपनी जमीन पर बैठे लोगों की समस्याओं की जिम्मेदारी नहीं ले पाई है।” बोहरा का कहना है कि हेलीकॉप्टर से कालापानी की तस्वीरें लेने वाले भूगोल के लोग यहां के बाशिंदों के दर्द की असलियत नहीं जानते हैं। अब तक छांगरू और टिंकर के दो गांवों ने सीमा की रक्षा की है। भारत पूरे साल कालापानी में सुरक्षाकर्मी रखता है, सीमा पर पहरा देता है। हमारे सुरक्षा गार्ड छांगरू में गागा तक पहुंच चुके हैं, लेकिन वे कितने महीनों तक रह सकते हैं? एक स्थानीय कमला बोहरा का कहना है कि अब तक दोनों देशों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं। छांगरू और टिंकर के स्थानीय लोगों के अस्सी-अस्सी प्रतिशत शादी- विवाह भारत के गुंजी कुटी के साथ हैं। हमारी बेटियां और बहनें भारत में हैं, उनकी बेटियां और बहनें यहां हैं लेकिन दोनों देशों के बीच अब संबंध अच्छे नहीं हैं। नेपाल के छांगरू टिंकर और भारतीय सीमा के गांवों को जोड़ने वाला सीतापुल सीमा बंद है। अब हम यह कहना चाहते हैं कि हम लोग कहां से हैं, न तो यहां के हैं और न ही वहां के हैं?

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