September 27, 2020

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’एक भारत श्रेष्ठ भारत अभियान के तहत झारखंड-गोवा’ पर वेबीनार का सफल आयोजन

रांची। पत्र सूचना कार्यालय एवं रीजनल आउटरीच ब्यूरो रांची तथा गोवा के संयुक्त तत्वाधान में आज युग्म राज्य झारखंड गोवा पर ’एक भारत श्रेष्ठ भारत अभियान’ के तहत एक वेबीनार का आयोजन किया गया।
इस वेबिनार के अध्यक्ष एवं पीआईबी, आरओबी रांची के अपर महानिदेशक अरिमर्दन सिंह ने शुरुआत करते हुए सभी पैनलिस्टों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि गोवा तथा झारखंड दो बिल्कुल भिन्न सांस्कृतिक परिवेश के राज्य हैं। जहां एक तरफ गोवा वैश्विक संस्कृति एवं अपने समुद्री किनारों के लिए मशहूर है, वहीं झारखंड यहां के आदिवासी समाज, कोयला तथा खनिजों की उपलब्धता एवं हरियाली के लिए जाना जाता है। दोनों प्रदेशों का खान-पान, वेशभूषा, रहन-सहन विभिन्न होने के बावजूद, दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और भारतवर्ष का हिस्सा है।
गोवा की मशहूर फोटोग्राफर एवं लेखक दिलीप मेंन्जिस ने कहा कि गोवा पुर्तगाली शासन के अंतर्गत काफी दिन रहा जबकि बाकी भारत ब्रिटिश शासन के अंतर्गत था, झारखंड भी। पुर्तगाली शासन में गोवा व्यापार का एक प्रमुख वैश्विक केंद्र रहा यहां से मोजांबिक, फिलीपींस, मकाउ यहां तक की नॉर्थ अमेरिका तक व्यापार होता। यह इस क्षेत्र में फैले पुर्तगाली शासन का केंद्र भी रहा और काफी फला फूला। गोवा पर कोंकड़ संस्कृति का काफी असर है, जिसमें खुलापन है। भारत में आलू, मक्का गोवा के जरिए ही पहुंचे, ये यहां की फसलें नहीं थी। अक्सर जब हम भारत की बात करते हैं तो इसमें झारखंड या गोवा की संस्कृति का उल्लेख नहीं होता है। हमें इस बात की तरफ ध्यान देना होगा कि जब भारत के चर्चा हो तो यह ज्यादा समावेशी हो। गोवा में रहने वाले आदिवासी समाज के बारे में उन्होंने कहा कि, गोवा एक अंतरराष्ट्रीय शहर के समान था, लेकिन जनजातीय संगीत और जनजातीय रहन सहन गोवा की हमेशा एक पहचान रही है।
इस वेबीनार में झारखंड के मशहूर लेखक एवं आदिवासी संस्कृति विशेषज्ञ महादेव टोप्पो ने सभी को झारखंड की समृद्ध परंपरा एवं संस्कृति से परिचय कराया।उन्होंने कहा कि झारखंड न सिर्फ अपने प्राकृतिक छटा और आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है बल्कि यहां पर सर्वोच्च कोटि का लौह अयस्क और कोयला पाया जाता है। उन्होंने प्रकृति से जुड़े राज्य के विभिन्न त्योहारों जैसे हार्वेस्ट इन के समय मनाया जाने वाला सरहुल जिसमें पृथ्वी का विवाह किया जाता है और उसके बाद ही उस पर हल चलाया जाता है कर्मा करमा पूजा, हरियाली पूजा के बारे में विस्तृत रूप से बताया। उन्होंने आदिवासी युवाओं के बीच प्रचलित अखरा नृत्य तथा पूर्व में प्रचलित धूमकुरिया के जरिए जंगल में जीवन यापन से जुड़ी शिक्षा एवं सामाजिक शिक्षा प्रणाली की भी चर्चा की।
वेबिनार को संबोधित करते हुए झारखंड के शिक्षाविद एवं आदिवासी संस्कृति विश्लेषक गिरधारी राम गोंझू ने कहा कि जनजातीय जीवन, पर्यावरण से इतना निकट है कि यहां गोत्र भी जानवरों के नाम पर है, जैसे नाग गोत्र आदि। किसी भी जंतु से जुड़े गोत्र के लोगों की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपने गोत्र के पशु पक्षियों की रक्षा करें।
जनजातीय समाज की यह भी विशेषता रही है की यहां समाज और गांव इस प्रकार रचाया बसाया जाता था कि वह आत्मनिर्भर हो। अगर गांव बसाया जाएगा तो साथ साथ वहां लोहार , कुम्हार आदि को भी बसाया जाएगा, ताकि गांव आत्मनिर्भर हो और समाज के हर वर्ग को रोजगार का अवसर भी प्राप्त हो।
वेबिनार में पीआईबी – आरओबी रांची तथा गोवा के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के अलावा विभिन्न राज्यों के भी कर्मचारियों तथा श्रोताओं ने हिस्सा लिया। इस वेबिनार का समन्वय एवं संचालन क्रमशः उपनिदेशक पीआईबी गोवा विनोद कुमार एवं मीडिया संचार अधिकारी पीआईबी मुंबई श्रियंका चटर्जी ने किया।

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