September 27, 2020

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प्रशांत भूषण को सजा देने पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

नई दिल्ली:- सुप्रीम कोर्ट ने वर्तमान चीफ जस्टिस और चार पूर्व चीफ जस्टिस को लेकर किए गए ट्वीट के मामले पर दोषी करार दिए गए वकील प्रशांत भूषण को सजा देने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने प्रशांत भूषण और अटार्नी जनरल की दलीलों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। पिछले 14 अगस्त को कोर्ट ने प्रशांत भूषण को इस मामले पर दोषी करार दिया था। सुनवाई की शुरुआत में प्रशांत भूषण की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि भूषण को बयान पढ़कर सुनाने दीजिए। तब जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि इसकी जरूरत नहीं है। अटार्नी जनरल बताएं कि क्या करना चाहिए । तब अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि पहले कई जजों ने भी ऐसे बयान दिए हैं। तब को ने अटार्नी जनरल को प्रशांत भूषण के स्पष्टीकरण के कुछ हिस्से पढ़ने को कहा। कोर्ट ने कहा कि पैरा 17 में लिखा है कि बतौर संस्था सुप्रीम कोर्ट ढह गया है। कोर्ट ने पूछा कि क्या ऐसे स्पष्टीकरण को स्वीकार किया जा सकता है। क्या उन्होंने अवमानना को ही और आगे नहीं बढ़ाया है। तब अटार्नी जनरल ने कहा कि 2009 के मामले में उन्होंने खेद जताया है। इसमें भी ऐसा कर सकते हैं । तब कोर्ट ने कहा कि उन्होंने किसी को नहीं बख्शा। पूर्व चीफ जस्टिस को पद से हटाने के लिए सांसदों के प्रस्ताव का ज़िक्र किया। अयोध्या और कुछ मामलों को कोर्ट की तरफ से ज़्यादा महत्व देने की बात कही। कोर्ट ने अटार्नी जनरल से पूछा कि आप यह बताइए कि अगर सज़ा देनी हो तो क्या दें। तब अटार्नी जनरल ने कहा कि आप कह दीजिए कि भविष्य में ऐसा बयान न दें। तब कोर्ट ने कहा कि हम जानते हैं कि दुनिया में कोई भी पूर्ण नहीं है। गलती सब से होती है। लेकिन गलती करने वाले को इसका एहसास तो होना चाहिए। हमने उनको अवसर दिया लेकिन उन्होंने कहा कि माफी नहीं मांगना चाहते हैं। राजीव धवन ने कहा कि मेरी ड्यूटी सिर्फ अपने मुवक्किल (प्रशांत भूषण) के लिए नहीं, कोर्ट के लिए भी है। मैं वरिष्ठ वकील की हैसियत से बोल रहा हूं। अगर आपको लगता है कि व्यक्ति संस्था के लिए किसी काम का नहीं है तो उसे सजा दें। अगर नहीं तो बतौर वकील किए गए उसके काम को देखें। धवन ने कहा कि मैंने कोर्ट में तत्कालीन चीफ जस्टिस खेहर को सुल्तान कहा था। फिर अपनी बात स्पष्ट की थी। अवमानना का मुकदमा नहीं चला। सुप्रीम के कंधे इतने चौड़े हैं कि आलोचना सहन कर सकें। तब कोर्ट ने कहा कि दोषी ठहराने का फैसला हो चुका है। अब सज़ा पर बात हो रही है। तब धवन ने कहा कि कोर्ट को बिना शर्त माफी के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए था। धवन ने कहा कि भूषण के अपने विचार हैं। उसके आधार पर बयान दिया। स्पष्टीकरण में बयान पर पक्ष रखा। उसके कुछ हिस्से उठा कर अवमानना को बढ़ाने वाला बताना सही नहीं। माफी ज़ोर देकर नहीं मंगवानी चाहिए। जिस बात में भरोसा रखते हों, उसके बारे में डर कर माफी मांगना ईमानदारी नहीं। धवन ने किहा कि संसद की आलोचना होती है। लेकिन वह विशेषाधिकार की शक्ति का कम इस्तेमाल करते हैं। सुप्रीम कोर्ट को भी भली मंशा से की आलोचना को उसी तरह लेना चाहिए। चीफ जस्टिस बाइक पर बैठे थे, सबने देखा। उस पर टिप्पणी अवमानना न समझें। इतिहास 4 पूर्व जस्टिसों के बारे में फैसला लेगा। यह कहना अवमानना नहीं माना जाना चाहिए। धवन ने प्रशांत भूषण का स्पष्टीकरण रिकॉर्ड से हटाने के सवाल पर कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने आइंदा ऐसा बयान न देने की चेतावनी पर कहा कि यह भी नहीं होना चाहिए। क्या किसी को भविष्य में आलोचना से रोका जा सकता है अगर आप केस बंद करना चाहते हैं तो कह सकते हैं कि वकील कोर्ट की आलोचना करते समय संयम रखें।

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