December 4, 2020

अनावरण न्यूज़

एक नयी सुबह का

मातृशक्ति का प्रतीक हैं, दीदी नीलम आनन्द

माँ प्रतीक है उस रूप का जो निर्माण करती है, पोषित करती है और विकास करती है। मां की शक्ति क्षमता एवं सामर्थ्य असीम करुणा से भरी उस धारा की तरह है जो अपने गर्भ में एक नए अस्तित्व का बीज बन कर रोपने को स्वीकारती है, अपने रक्त से उसे पोषित और विकसित करती है। जब भी हम शक्ति की बात करते हैं एक स्त्री का ही स्वरूप सामने उभरता है। उससे भी अद्भुत बात यह है कि स्त्री में भी केवल मां का रूप ही दिखाई देता है। शिव की समस्त शक्तियां नारी रूप में विश्व में पूजित हैं। सामान्य जन उन शक्तियों को मां कह कर पुकारते हैं। अनंत मातृ शक्तियों में से एक हैं ममतामयी दीदी नीलम आनंद। वैसे तो लौकिकता में तीन संतानों की जननी आज लाखों अध्यात्मिक संततियों की जननी हैं।

इस धरती पर दीदी राजमणि नीलम नीलम आनंद के यूं तो अनेकों रूप का साक्षात्कार लोगों ने किया है परंतु उनके ममता और करुणा से आद्र मां के रूप में सबको श्रद्धा से नतमस्तक होने को विवश कर दिया है। सातवें दशक में जब उनके पति साहब श्री हरीन्द्रानंद जी ने शिव को अपना गुरु बनाया और इस रहस्य को उनके साथ साझा किया तत्क्षण दीदी नीलम आनंद जी ने भी शिव को अपना गुरु स्वीकारा। 1980 के दशक से शिव के गुरु स्वरूप की चर्चा जब घर के कमरे से बाहर लोगों के साथ होने लगी, उन्होंने कंधे से कंधा मिलाकर साहब श्री हरीन्द्रानंद जी के साथ दिन रात तीव्र गति से अपना पूर्ण सहयोग दिया। उस समय के गुरु भाई/ बहन बताते हैं कि शाम में चर्चा शुरू होती थी। साहब के साथ दीदी की छाया की तरह निरंतर बैठी रहती। घंटों की शिव चर्चा में डूबे लोगों की एकाग्रता तब भंग होती जब वो कहती कि अब तो हाथ मुंह धो लीजिए, सुबह हो गई है।

सबके भोजन और विश्राम की व्यवस्था करती दीदी अपने स्नेह और दुलार से क्षण भर में सब में उर्जा भर देती। लोग साहब के सामने तो कुछ नहीं बोलते परंतु जैसे ही साहब कार्यालय के लिए रवाना होते सब दीदी को घेर कर बैठ जाते। श्री हरीन्द्रानंद जी गुरु आदेशित कर्म के प्रति जितना कठोर आवरण रखते, दीदी नीलम आनंद उतनी ही कोमलता से सबको लौकिक कष्टों से निवृत्त होने का रास्ता दिखाती। साहब अक्सर कहते कि आप क्यों ऐसा करती हैं। दूसरों का कष्ट कम करने में उनका प्रारब्ध तो आपको ही भोगना होगा। गुरु शिव हैं, लोग उनसे दया मांगेंगे, परंतु मां तो मां होती है। शिव के शिष्य अपने गुरु के आदेशित कर्म को करने चलेंगे तो रास्ते के कांटों को तो वो चनेंगी ही, भले ही इसमें उनकी अपनी उंगलियां घायल हो जाएं। कोई अगर उनके सामने रो पड़ता तो दीदी भी रो पड़तीं। एक सरल और सहज प्रेम जो अपने दायरे में आने वाली हर चीज को भिंगो देती है। अपने छोटे से घर में मानो उन्होंने कोई विशाल लोक स्थापित कर लिया था, जिसमें शिव का नाम लेने वाला कोई भी व्यक्ति आ जा सकता था। मां से जुड़ी कई कहानियां आप को प्रेरित करेंगी, शिव कार्य में उनकी तत्परता आपको उद्वेलित करेंगी। दीदी नीलम के जीवन की धुली हैं हम, बस उनके आशीर्वाद की छांव में हमसबों का परिवार रहे, ऐसी श्रद्धांजलि हम अर्पित करते हैं।

अनुनिता आनन्द

लेखिका महागुरु महादेव पत्रिका की संपादक और अनमिल आखर की लेखिका हैं।

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