December 2, 2020

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कमर्शियल माइनिंग पर भाजपा गलत बयानी बंद करे- वामदल

राँची:- वाम दलों ने आरोप लगाया है कि कमर्शियल माइनिंग के लिए कोल ब्लॉक के नीलामी के मुद्दे पर केंद्र सरकार के पूरी तरह बेनकाब हो जाने से भाजपा के नेतागण बौखला गए हैं और गलत बयानी कर सच्चाई पर पर्दा डालने का काम कर रहे हैं।
वामपंथी नेताओं ने कहा कि कमर्शियल माइनिंग के लिए चिन्हित कोल ब्लॉक के नीलामी मे केंद्र सरकार पांच बार विफल रही है। क्योंकि कोई भी खरीददार सामने नहीं आया। इस परिस्थिती में प्रधानमंत्री ने नीलामी के लिए खुद मोर्चा संभाल लिया है। केंद्र सरकार कमर्शियल माइनिंग के लिए इतनी उतावली है कि उसने खनिज विधि (संशोधन) अधिनियम 2020 जिसकी अवधी 14 मई को खत्म हो जाने के बाद भी पहले 11 जून और बाद में 18 जून को नीलामी की प्रक्रिया शुरु कर दी। और देश के मुखिया ही इसकी मॉनिटरिंग कर रहे थे।
केंद्र सरकार की इस जन विरोधी, मजदूर विरोधी और राष्ट्र विरोधी निर्णय के खिलाफ सबसे पहले देश के कोयला मजदूरों ने विरोध का विगूल फूंका और पिछले दिनों इसके खिलाफ लगातार आंदोलन भी किए। अब कोयला मजदूर पूनः कमर्शियल माइनिंग के फैसले के खिलाफ दो से चार जुलाई तक तीन दिवसीय हड़ताल पर जा रहे हैं। दूसरी ओर हेमंत सरकार ने राज्य के पर्यावरण, जंगलों की रक्षा और संविधान की पांचवी अनुसूची से आच्छादित इस क्षेत्र में निवास करने वाले आदिवासियों और दूसरे गरीबों को एक नए विस्थापन से बचाने के लिए केंद्र सरकार के असंवैधानिक फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई। छत्तीसगढ़ के वनमंत्री ने भी इन कोल ब्लॉक से वाणिज्यिक खनन होने पर वहां के पर्यावरण और वन्य प्राणियों की सुरक्षा पर सवाल उठाते हुए इस पर रोक लगाए जाने की मांग की है। महाराष्ट्र सरकार ने भी कोविड 19 के दौर में कोल ब्लॉक के नीलामी के लिए भाजपा की बेसब्री पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है।
उन्होंने कहा कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और अभी अभी घर वापसी किए बाबूलाल मरांडी का यह कथन पूरी तरह गलत है कि कमर्शियल माइनिंग से राजस्व की बढ़ोत्तरी होगी। उपलब्ध तथ्य बताते हैं कि सावर्जनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया किसी भी प्राइवेट खनन कंपनी से बहुत ज्यादा राजस्व केंद्र व राज्य सरकार को देती है। वर्ष 2018 अप्रैल से मार्च 2019 तक इस एक वर्ष में ही कोल इंडिया की झारखंड में कार्यरत कंपनियों सीसीएल, बीसीसीएल और ईसीएल ने झारखंड सरकार को 3 हजार 150 करोड़ रूपए का राजस्व दिया है। इसके अलावा जिला खनन कोष (डीएमएफ) से 742 करोड रुपए और मिनिरल एक्सप्लोरर ट्रस्ट में 64 करोड़ रुपए यह राशि कुल मिला कर 3 हजार 956 करोड़ रुपए होती है। क्या बाबूलाल जी बताएंगे कौन सी प्राइवेट कपनी इतना राजस्व देगी। कोल इंडिया द्वारा बिक्री कर, जीएसटी और लाभांश से भी राजस्व का एक बड़ा हिस्सा सरकारी खजाने में जमा कराया जाता है। कोल इंडिया ने पिछली वित्तीय वर्ष में डिविडेंड समेत अन्य स्रोतों को मिला कर कुल 60 हजार करोड़ रूपए भारत सरकार को दिया है। कोई भी कॉरपोरेट घराना जिसका वार्षिक टर्नओवर कोल इंडिया से काफी ज्यादा है। सरकार को इतना राजस्व नही देता है। वे उल्टे एनपीए के नाम पर बैंको की राशि हड़प लेते हैं। और मोदी सरकार उन्हें लगातार करों में छूट दे कर उनकी तिजोरियां भरने के काम में लगी हुई है।
कमर्शियल माइनिंग के पीछे कॉरपोरेट घरानों को औने पौने नीलामी मूल्य में हमारे राज्य की रत्नगर्भा धरती की खनिज संपदा को सौंपने का एजेंडा शामिल है। झारखंड में कोल बलॉक की नीलामी के लिए लातेहार, पाकुड़, दुमका और गिरीडीह जिले में जिन स्थानों को चिन्हित किया गया है। वहां वनों का घनत्व अधिक है। यहां निजी कंपनियों द्वारा असंवैधानिक तरीको से खनन किए जाने के चलते यह इलाका तबाह हो जाएगा। क्योंकि जंगल पूरी तरह से नष्ट हो जाएंगे। रैयतों व ग्रामीण जनता को विस्थापन का दंश झेलना पड़ेगा। और वे उजड़ जाएंगे। इस पृष्टभूमि में वामदल, झारखंड के सामाजिक संगठन, ट्रेड यूनियन कमर्शियल माइनिंग के खिलाफ प्रतिराध की एक मजबूत दीवार खड़ा करेंगे। आगामी दो जुलाई को वामदलों का राज्यव्यापी विरोध दिवस इसकी शुरुआत है।

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