November 28, 2020

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कई राज्यों में फंसी हैं झारखंड की 24 हजार गर्भवती महिलाऐं

दवाएं और राशन खत्म, डॉक्टर और जांच के पैसे नहीं

राँची:- झारखंड सरकार के मुताबिक, बाहर फंसे हुए राज्य के लोगों की संख्या 10 लाख 40 हजार 225 है। झारखंड सरकार प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए बनाए ‘प्रवासी मजदूर कंट्रोल रूम’ की कमान संभाल रहे फिया फाउंडेशन के मुताबिक, कुल प्रवासियों में से 7 लाख 45 हजार 446 मजदूर झारखंड वापस लौटने के लिए अपना रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। प्रवासियों की कुल संख्या में 1 लाख 42 हजार 176 महिलाएं भी हैं, जो झारखंड से बाहर कई राज्यो में फंसी हुई हैं। इन्हीं महिलाओं में 24 हजार गर्भवती महिलाएं भी हैं।

लेकिन इन गर्भवती महिलाओं तक सरकारी महकमा कितनी राहत पहुंचा पा रहा है, इसे वेस्ट मुंबई में फंसे 23 वर्षीय दीपक कुमार और उनकी 22 वर्षीय पत्नी जागृति प्रजापति की कहानी से समझा जा सकता है। जागृति नौ महीने की गर्भवती हैं। डॉक्टर ने दीपक से पत्नी को किसी बड़े और अच्छे अस्पताल में भर्ती कराने को कहा है। उनसे फोन पर बात हुई तो बताया, ‘अल्ट्रासाउंड में पता चला है कि बच्चे की बैक बोन बैंड हो गई है। डॉक्टर ने कहा है कि केस क्रिटिकल है, उसे बड़े अस्पताल में भर्ती कराओ।’

दस हजार रूपये महीने की तनख्वाह पर मुंबई की एक कंसल्टेंसी कंपनी में कॉल रिसीव करने का काम करने वाले दीपक कुमार कहते हैं, ‘दो महीने से घर पर बैठा हूं। डॉक्टर ने पत्नी को दो हफ्ते का समय दिया है। चेकअप कराने के लिए ससुराल वालों ने चार हजार रुपए भेजे थे। तब जाकर अल्ट्रासाउंड करा पाए। अब डॉक्टर कहते हैं कि एमआरआई कराना पड़ेगा।’

जमशेदपुर के रहने वाले दीपक बताते हैं, ‘हमें दो हजार रुपए झारखंड कोरोना सहायता ऐप से मिले थे। जो डॉक्टर को दिखाने में खत्म हो गए, अब हम डिलीवरी के लिए पैसा कहां से लाएं? पहली बार बाप बनने जा रहे हैं, लेकिन खुशी कैसे मनाएं? पत्नी के इलाज और राशन के लिए झारखंड के हेल्पलाइन नंबर पर कई बार कॉल किया, लेकिन उन्हें कोई मदद नहीं मिली। स्थानीय नगर जनसेवक जो भोजन देते थे वो और उनकी पत्नी वही खाते थे। लेकिन 16 मई के बाद से वो भी बंद हो गया।’

जहां रहता हूं, वहां का बिजली-पानी दोनों ही कनेक्शन काट दिया है।

दो दिन बाद दीपक का मैसेज आता है। मैसेज में लिखा है, ‘मैं जहां रहता हूं, वहां का बिजली-पानी दोनों ही कनेक्शन काट दिया है। पानी नहीं होने के कारण मेरी पत्नी सुबह से बाथरूम नहीं गई है और ना वो कुछ खा रही है। प्लीज सर मेरी मदद करवा दीजिए।’

लॉकडाउन के बाद बाहर फंसे बेबस और लाचार मजदूरों की सूची में कुंदन विश्वकर्मा और उनकी पत्नी ज्योति विश्वकर्मा भी हैं। धनबाद के कतरास के रहने वाले कुंदन एक साल पहले यूपी के नोएडा सेक्टर-101 में ठेकदार की मदद से एक कंस्ट्रक्शन साइट पर वेल्डिंग का काम करने पहुंचे थे।

यहां 9 हजार की पगार में वो और उनकी गर्भवती पत्नी गुजारा करते रहें हैं। बोले, ‘पहले तो गुजारा कर लेते थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद से बहुत परेशानी हो रही है। सबको कॉल किया, झारखंड सरकार को भी (हेल्पलाइन नंबर पर), लेकिन कोई मदद नहीं मिली।”

कुंदन दो महीने से बेरोजगार हैं। बताते हैं, ‘मैं छह साल से मजदूरी का काम करते आ रहा हूं, गुजरात, हैदराबाद में भी काम किया, लेकिन इतनी परेशानी कभी नहीं हुई। मेरी पत्नी के पेट में बच्चा है। यह मेरा पहला बच्चा है। इलाज या जांच के लिए मेरे पास पैसा नहीं है। मेरा बच्चा खराब ना हो जाए, इसलिए मैं झारखंड अपने घर जाना चाहता हूं। अचानक से अगर इसको दर्द उठ जाएगा तो हम क्या करेंगे?’

अब दवाई की बात तो दूर दो वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल हो रहा है।

पिछले एक महीने में झारखंड में करीब 12 गर्भवती महिलाओं के साथ अस्पताल और डॉक्टरों की बदसूलकी और बदइंतजामी की खबरे आईं हैं। राज्य के दो सबसे बड़े शहर जमशेदुपर और रांची से पांच ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें गर्भवती महिलाओं का समय पर इलाज नहीं हो पाने के कारण गर्भ में ही उनके बच्चे की मौत हो गई। चुनौती उन गर्भवती महिलाओं के लिए ज्यादा है जो प्रदेश से बाहर फंसी हुई हैं। घर में राशन खत्म हो चुका है और पति की मजदूरी महीनों पहले छूट गई थी। अब दवाई की बात तो दूर दो वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल हो रहा है।

बेंगलुरू एयरपोर्ट पर पिछले तीन साल से कैंटीन में काम करने वाले संजय 25 मार्च के बाद से बेरोजगार हैं। हर महीने 15 हजार पगार में से उन्हें छह हजार रूम रेंट देना पड़ता था। बाकी में वो और उनकी पत्नी शिवाली जिंदगी गुजर बसर कर रहे थे। लेकिन अब उनके पास राशन और पैसा दोनों ही खत्म हो गया है।

संजय कहते हैं, ‘मकान मालिक रूम रेंट के लिए हर दिन बोलता था। जो पैसा पास में था, उसे देकर हम घर खाली करके बेंगलुरू यशवंतपुर अपने एक रिश्तेदार के यहां आ गए हैं। मगर खाने के लिए राशन यहां भी नहीं है।’

मेरे पास जहर खाने तक के पैसे नहीं हैं।

संजय कहते हैं, ‘मेरे पास जहर खाने तक के पैसे नहीं हैं। हेल्पलाइन पर कॉल किया। पांच-छह नंबर पर अब तक बात हो चुकी है। कहते हैं कि आपका नंबर दे दिया गया है वे लोग कॉल करेंगे। लेकिन कुछ मदद नहीं हुई।’

गुजरात के अहमदाबाद में छोटू कुमार एक कपड़ा मील में रोज 12 घंटे बिना रविवार की छुट्टी के काम करते थे। बदले में 8 हजार पगार मिलती थी। 25 मार्च को लॉकडाउन के बाद बचे कुछ पैसों से जैसे तैसे गुजर किया। लेकिन 17 मई को भुखमरी से सामना हुआ।

पत्नी चार महीने की गर्भवती हैं, बिस्किट चाय ही नसीब हुआ। छोटू कहते हैं, ‘हमको पत्नी के कान की रिंग बेचनी पड़ी, सिर्फ 1900 रुपये ही मिले। कुछ दिन और यहीं रहते तो मैं, पत्नी और मेरा आने वाला बच्चा भूखा मर जाता।’ छोटू 21 मई को साबरमती रेलवे स्टेशन से पटना के लिए निकली ट्रेन पर बैठ गए।

प्रवासी मजदूरों को एक-एक हजार रुपये की मदद देने के लिए झारखंड सरकार ने कोरोना सहायता ऐप बनाया, कई प्रवासी मजदूरों ने उस पर रजिस्ट्रेशन कराया था। ऐप की योजना जमीन पर असफल रही तो योजना को बंद कर दिया। बदं किए जाने तक तीन लाख प्रवासी मजदूरों ने उस पर रजिस्ट्रेशन करवाया था।

फिया फाउंडेशन के राज्य प्रमुख जॉनसन टोपनो का मानना है कि विभिन्न राज्यों में फंसे झारखंड के प्रवासी मजदूरों को वहां की राज्य सरकार पर्याप्त मदद पहुंचाने में सक्षम नहीं है। वो कहते हैं, ‘बाहर फंसे मजदूरों की हालत काफी दयनीय है। जहां-जहां मजदूर फंसे हुए हैं वहां के स्थानीय प्रशासन से जब उन्हें मदद नहीं मिल पाई, तो हमलोगों को सिविल सोसाइटी और एनजीओ से मदद लेनी पड़ी लेकिन फिर भी हम इन मजदूरों की परेशानी कम नहीं कर पाए।’

इसी संस्था में कार्यरत एक कर्मचारी के मुताबिक, ‘बाहर फंसी प्रेग्नेंट महिलाओं के साथ काफी परेशानियां आ रही है। मैंने करीब ऐसी 12 से ज्यादा महिलाओं का फोन रिसीव किया, जिनके पास खाने के लिए राशन तक नहीं हैं। हम लोंगो की कोशिश के बावजूद भी उन्हें मदद नहीं पहुंच पाई।’

झारखंड प्रवासी मजदूरों के लिए नियुक्त चीफ नोडल ऑफिसर अमरेंद्र प्रताप सिंह गर्भवती महिलाओं को हो रही समस्या के सवाल पर कहते हैं, ‘एक-एक व्यक्ति के लिए कोई प्लानिंग तो नहीं है। इनकी (गर्भवती महिलाओं की) कितनी संख्या है, ऐसे कितने लोग, कहां पर हैं, हमे यह भी नहीं पता है। जो जहां पर है, उस स्टेट की जिम्मेदारी है कि उसका ध्यान रखें। अगर कोई दूसरे स्टेट का मेरे यहां व्यक्ति है और वो बीमार पड़ेगा, तो उसका ध्यान रखने की जिम्मेदारी हमारी है।

झारखंड सरकार का दावा है कि एक मई से लेकर 22 मई तक रोड और ट्रेन के माध्यम से 3 लाख से ज्यादा प्रवासी लोग झारखंड वापस लौटे हैं। इनमें मजदूरों के अलावा छात्र, पर्यटक समेत अन्य लोग भी शामिल हैं।

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