November 28, 2020

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बिजली के फिक्स्ड चार्ज से मुक्ति नहीं मिली तो “ताबूत में आखिरी कील” साबित होगी-बाबूलाल मरांडी

राँची:- भारतीय जनता पार्टी विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि उद्योगों को बिजली के फिक्स्ड चार्ज से मुक्ति मिली, तो ताबूत में आखिरी कील साबित होगी।
बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लिखे पत्र में बताया कि उनके सुझाव का सम्मान करते हुए सरकार यथोचित निर्देश दिया और टाटा मोटर्स के खुलने की व्यवस्था हो गयी। स्वाभाविक है कि उसके साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़े उसकी एंसीलरी के 1100 छोटे उद्योग भी खुलेंगे। इन छोटे उद्योगों का मार्च महीने का एक तिहाई और पूरे अप्रैल-मई महीने का अर्थात करीब ढाई महीने का बिजली बिल बकाया है, जिसका भुगतान करने के बाद ही वे कारखाने का संचालन दुबारा शुरू कर पायेंगे।
उन्होंने कहा कि कोरोना आपदा की वजह से मानवीय मूल्यों का हवाला देकर या कानूनी प्रावधानों का भय दिखाकर इन छोटे उद्योगों से मजदूरों के पूरे पारिश्रमिक का भुगतान भी करा दिया गया है। इन लघु उद्योगों को एकमात्र राहत केंद्र सरकार के प्रयास से मिली है, बैंक उन्हें लोन की किश्तें अदा करने के लिए तंग नहीं कर रहे हैं।
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि कोरोना आपदा के दौरान उद्योगों के संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने हाल ही में एक निर्णय लिया है जो अंततः लघु उद्योगों को राहत देने के उद्देश्य से ही है। केंद्र सरकार ने भारत सरकार की एनर्जी का प्रोडक्शन कम्पनी, जेनरेटिंग कंपनी और ट्रांसमिशन कंपनी को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे राज्य की वितरण कंपनियों के विरुद्ध कोई उत्पीड़क कार्रवाई नहीं करेंगी। इसके साथ- साथ 90 हजार करोड़ रुपये का पैकेज डिस्ट्रीब्यूशन कम्पनियों के लिए भी उन्होंने घोषित किया, जिसमें कुछ हजार करोड़ रूपये झारखण्ड की वितरण कंपनी को जरुर मिलेगा।
स्वाभाविक तौर पर यह अपेक्षा थी कि वितरण कम्पनियां केंद्र सरकार से मिली इस बड़ी राहत का लाभ उपभोक्ताओं, विशेषतः उद्योग-व्यापार तक पहुंचायेंगी। उन्होंने कहा कि राहत देने का प्राथमिक और सर्वाधिक सुलभ तरीका उद्योग-व्यापार को बिजली के फिक्स्ड चार्ज से राहत देना ही है। अधिकांश राज्यों में फिक्स्ड चार्ज से उद्योग-व्यापार को मुक्ति दे दी गयी है। लेकिन झारखण्ड में अबतक इसकी चर्चा तक नहीं है। छोटे उद्योग-व्यापार के सभी संघ-संगठन त्राहिमाम कर रहे हैं, लेकिन कोई सुन नहीं रहा है।
बाबूलाल मरांडी एक तरफ रोजगार देने की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ एक्जिस्टिंग इंडस्ट्रीज जो सबसे ज्यादा रोजगार देने में सक्षम हैं, उनका त्राहिमाम सन्देश कोई सुन नहीं रहा है, सब कान में रुई डालकर बैठे हुए हैं। न सरकार सुन रही है, न उसके अधिकारी सुन रहे हैं, यही तो विडम्बना है।
उन्होंने बताया कि उन्हें यह जानकारी दी गयी है कि विद्युत् आपूर्ति कम्पनी और उपभोक्ता के बीच में होनेवाले करार के क्लाउज 13 का प्रावधान है कि यदि किसी अपरिहार्य कारण से उपभोक्ता अर्थात उद्योग-व्यापार बिजली नहीं ले पाते हैं तो उन्हें फिक्स्ड चार्ज से इसको मुक्ति मिलेगी। इसके लिए करार में कोई प्रक्रिया निश्चित नहीं है लेकिन परम्परा है कि उन्हें रिफंड के प्रोसेस में जाना पड़ता है। यदि ऐसी परम्परा या प्रावधान नहीं हो या उसमें कोई विवाद हो तो भी, क्या राज्य सरकार इनको अपने हाल पर छोड़ देगी, कोई मदद नहीं करेगी ? राज्य सरकार ने करीब 10 लाख प्रवासियों को राज्य में ही रोजगार उपलब्ध कराने का वादा किया है। इनमें से अधिकांश कुशल औद्योगिक श्रमिक हैं जो अन्य राज्यों में भी छोटे उद्योग-व्यापार से जुड़कर ही आजीविका पा रहे थे। पहले से भी राज्य के लाखों श्रमिक ऐसी छोटी औद्योगिक-व्यापारिक इकाईयों में रोजगार पा रहे हैं। कोरोना आपदा की वजह से राज्य की इन औद्योगिक-व्यापारिक इकाईयों की कमर पहले से टूटी हुई है, ये मृतप्राय हो चुके हैं। अगर इन्हें बिजली के फिक्स्ड चार्ज से मुक्ति नहीं मिली तो इनके लिए यह “ताबूत में आखिरी कील” साबित होगी। इसके साथ ही, राज्य के लाखों श्रमिकों के रोजगार का सबसे उपयुक्त और सुलभ मार्ग भी बंद हो जाएगा।
उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि राज्यहित और श्रमिक हित में अविलम्ब राज्य के उद्योग-व्यापार को बिजली के फिक्स्ड चार्ज से राहत देने के लिए सम्बंधित संस्थाओं- पदाधिकारियों को निर्देशित करने की कृपा करें।

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