November 27, 2020

अनावरण न्यूज़

एक नयी सुबह का

भूमिज मुंडा समाज की आदिवासी महिला ने किया निशुल्क चना और गुड़ का वितरण

सरायकेला:- क्या आपने कभी सुना है कि जिसके पास खुद के खाने के लाले पड़े हो वह दूसरों के पेट में लगी आग को बुझाने में लगी हुई है। जी हां हम बात कर रहे हैं ऐसी ही एक महिला की। जिला सरायकेला खरसावां के अंतर्गत गम्हरिया प्रखंड परिसर में एक ऐसे ही महिला को दूरदर्शन के कैमरे ने देखा।

जिले की गर्मी थमने का नाम ही नहीं ले रही, लॉक डाउन 4 चल रहा है आम से खास सभी लोगों को कई तरह की परेशानियां हो रही हर दिन गम्हरिया प्रखंड में गरीब से लेकर तमाम अमीर लोगों के आने-जाने का तांता लगा है क्या पता इस लॉक डाउन के दौरान किसे कैसी सरकारी जरूरत आन पड़े? किसी को अनाज नहीं मिल रहा है तो कोई दूसरे प्रदेशों से अपने रिश्तेदारों और परिवार के फंसे सदस्यों को लाना चाह रहा है सब की एक ही आस है गम्हरिया प्रखंड में उपस्थित प्रखंड विकास पदाधिकारी और अंचल अधिकारी के समक्ष अपना दुखड़ा रोए ऐसी गर्मी में बड़े-बड़े लोग तो अपनी ए.सी गाड़ियों से आते हैं और चले जाते हैं लेकिन वहां ऐसे गरीब लोग भी आते हैं जिन्हें या तो राशन मुहैया नहीं हो पा रहा है या तो उन्हें राशन कार्ड बनवाना है और पूरे भारत में तालाबंदी होने के कारण किसी भी होटलों को खोलने की अनुमति नहीं है। साहब से मिलने आते हैं तो मिलते मिलते कड़ी धूप हो जाती है लोग भूखे रहते हैं इधर-उधर आस और बाट निहारते रहते हैं लेकिन खाने को कुछ नहीं मिलता है इन सब मामलों के बीच एक महिला उन तमाम लोगों के लिए उस वक्त सबसे बड़ा सहारा बनती है उन्हें चना और गुड़ अपने हाथ से बने हुए पत्ते के दोने में देती है और वह भी निशुल्क;जी हां बिल्कुल फ्री ।

है यह महिला?

क्या यह किसी एनजीओ या किसी ऐसी संस्था से जुड़ी हुई है?क्या यह बहुत दयालु है?क्या यह कोई सरकारी अधिकारी है?जी नहीं इस महिला का दुख आप सुनेंगे तो रो देंगे।
इस महिला का नाम है गीता देवी उर्फ गीता सरदार इस महिला ने अपना दुख कैमरे के सामने कहा लॉकडाउन के शुरू होते इस महिला के पति ने इसके साथ-साथ इस दुनिया का भी साथ छोड़ दिया और यह महिला आज विधवा का जीवन जीने के लिए मजबूर हो गई डेली मजदूरी करने वाली या महिला बिल्कुल टूट चुकी लेकिन इसका आत्मसम्मान देखिए पति के गुजर जाने के बाद इसने गम्हरिया प्रखंड के बाहर एक अलग ही निश्चय कर लिया तमाम लोगों को चना और गुड़ की सुविधा बिना पैसे के मुहैया कराने लगी। जी हां यह महिला एक भूमिज मुंडा समुदाय से आती आपको बता दें या वही समुदाय जिसने झारखंड बनाने में अपनी सबसे अहम भूमिका निभाई है भगवान बिरसा मुंडा भी इसी समुदाय से आते हैं लेकिन इस महिला के पति के गुजर जाने के बाद इसे काफी मशक्कत करने पर सिर्फ 10 किलो चावल मुहैया कराया गया आज भी यह अपनी वेदना बोलते बोलते रो बैठती है कहां है वह बड़े-बड़े दावे जो यह कहते हैं हम आदिवासी के बहुत बड़े नेता हैं! अगर सच देखना है तो गम्हरिया प्रखंड के बाहर इस कलयुग में साक्षात देवी को देखिए जो सिर्फ इंसानों का ही नहीं इस गर्मी की तपन से परेशान जानवरों का भी पेट अपने चने और गुड़ से भर रही है। पूरे दिन चने और गुड़ बांट कर जो भी चना और गुड़ बचता है यह महिला उसे घर लेकर नहीं जाती बल्कि वहां मौजूद जानवरों को खिलाती है उसका कहना है कि मैं एक असहाय गरीब आदिवासी महिला हूं;लेकिन अगर मेरे हाथों किसी का पेट भरता है तो मुझे सबसे ज्यादा खुशी उसी में होगी।इस भावना को समझने की जरूरत है दूरदर्शन की अपील होगी ऐसी महिला पर तुरंत सरकार एक अच्छा कदम उठाए इसी क्षण इसे विधवा पेंशन मुहैया कराया जाए।

Recent Posts

%d bloggers like this: