October 27, 2020

अनावरण न्यूज़

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पर्यावरण दिवस पर विशेष : अब भी वक्त है सुधरने का नहीं सुधरे, ताे जायेगी जान

राँची :- हाल ही की खबर है कि राजस्थान के चुरू में तापमान 50 डिग्री से ऊपर चला गया था । देश के कई हिस्साें में 47-48 डिग्री तक की खबरें आती रही हैं । यह प्रकृति की आेर से मानव जाति काे सुधरने की गंभीर चेतावनी है । ऐसे कई और संकेत प्रकृति लगातार दे रही है । पानी का गंभीर संकट दिख रहा है । हजार फीट बाेरिंग करने के बावजूद पानी नहीं मिल रहा है । पानी के लिए संघर्ष हाे रहा है ।  दिवाली के बाद दिल्ली में प्रदूषण का जाे हाल हुआ था, वह सभी काे याद है । सांस लेना मुश्किल । दम ऐसा घूंट रहा था कि विदेशी खिलाड़ियाें ने एक समय ताे मैच खेलने से इनकार कर दिया था । ऐसे हालात ताे पहले नहीं थे। देश के दूसरे राज्याें के पुराने दिनाें की बात छाेड़िए । सिर्फ 50 साल पहले के झारखंड काे याद कीजिए । दादा-दादी, नाना-नानी या समाज के वृद्ध व्यक्ति सब कुछ साफ-साफ बता सकते हैं । घने जंगलाें से भरा था झारखंड । रांची, हजारीबाग और नेतरहाट ताे खास था । यहां की जलवायु इतनी अच्छी थी कि देश के कई हिस्साें से स्वास्थ लाभ के लिए लाेग झारखंड आते थे । रवींद्र नाथ टैगाेर की बेटी जब गंभीर रूप से बीमार थी ताे चिकित्सकाें के कहने पर टैगाेर स्वास्थ लाभ के लिए अपनी बेटी काे लेकर हजारीबाग आये थे और लगभग दाे माह वहां रहे थे । यह थी झारखंड की खासियत। इसी झारखंड में आज तापमान 45-46 तक जा रहा है । रांची शहर की बात करें ताे हजाराें बाेरिंग फेल हाे चुकी है । पानी के लिए त्राहिमाम मचा है । काैन है दाेषी?  मंगल ग्रह से आ कर किसी ने यह हालात पैदा नहीं की है । हम सभी ने मिल कर इसे बर्बाद किया है । जंगलाें का नष्ट किया है । अब झारखंड में सिर्फ 28 फीसदी जंगल बचे हैं । (हालांकि अभी भी कई राज्याें से यह आंकड़ा बेहतर है) लगातार पेड़ काटे जा रहे हैं ।  एक उदाहरण ही काफी है समझने के लिए । रांची से पटना जाे लाेग भी 10 साल पहले बस-कार से गये हाेंगे, उन्हें याद हाेगा कि सड़क की दाेनाें आेर बरगद, पीपर, नीम, ईमली, आम,जामुन के बड़े-बड़े पेड़ हाेते थे । जीटी राेड के किनारे भी ऐसे पुराने-पुराने (दाे साै, तीन साै वर्ष पुराने)  पेड़ थे । जाने के दाैरान गरमी का अहसास नहीं हाेता था । राेड चाैड़ा किया, पेड़ काट दिये गये । अब वीरान नजर आता है ।जब गरमी के दिनाें में इन्हीं सड़काें से गुजरना पड़ता है, तब अहसास हाेता है । शायद ही कहीं पेड़ मिल जाये । सड़क चाैड़ा करने से किसने राेका है लेकिन अगर पेड़ काटा है ताे उसी तेजी से लगाये भीं याेजना ऐसी बने कि सड़क बनते-बनते काम के लायक पेड़ बड़े हाे जायें । यहां ताे 10 साल पहले राेड बने और पेड़ का पता ही नहीं । अफसराें या जिन्हें भी इस संबंध में निगरानी करनी है, ने लाेगाें के जीवन से खिलवाड़ किया है । इसकी कीमत सभी काे चुकानी पड़ रही है । अब भी वक्त है चेतने का । वरना बुरे दिन ताे अभी आनेवाले हैं ।पानी की बात कीजिए । जब जंगल कट जाये, पेड़ नहीं लगाये जायें ताे इसका असर बारिश पर पड़ना ही है । बाेरिंग कराने के बाद पानी नहीं निकल रहा है या बाेरिंग फेल हाे रहा है । साधारण गणित है । इसे समझना हाेगा । जमीन के अंदर पानी है ही नहीं ताे निकलेगा कहां से? बारिश का पानी जमीन के अंदर जायेगा, तभी ताे पानी निकलेगा ।  लाेग घर बना रहे हैं, अपार्टमेंट बन रहे हैं, मिट्टी से पानी जमीन के अंदर जाने के लिए जगह नहीं छाेड़ रहे हैं ।सब जगह सीमेंट से पक्का कर रहे हैं । ईश्वर ने झारखंड के लिए1200 मिमी बारिश का काेटा रखा है । अच्छा काेटा है लेकिन बारिश के अधिक से अधिक पानी काे राेक पायेंगे तभी इसका फायदा मिलेगा । घर पक्का, सड़क पक्की, नाली पक्की ।पानी रिसेगा ताे कहां से? सीधे नदी हाेते हुए समुंद्र में जाता है पानी ।सरकार ने वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम हर घर-हर अपार्टमेंट में बनाने का नियम बनाया है । कागज पर नियम है निगम के कर्मचारी जाते हैं । जहां वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं बना है ताे सिर्फ नाम का बना है, उसे भी पैसे लेकर प्रमाण पत्र दे देते हैं ताकि फाइन नहीं देना पड़े । जांच हाे ताे सारी चीजें सामने आयेंगी । काेई कार्रवाई नहीं हाेती । गलत प्रमाण पत्र लेते वक्त ताे मजा आता है लेकिन जब उनके यहां पानी का संकट आता है और पानी बाहर से ढाेना पड़ता है ताे पछताने के अलावा काेई रास्ता नहीं बचता । कुछ नीतियां भी बने । रांची की ही बात करें ताे यहां साै से ज्यादा ही गाड़ी धाेने के केंद्र हाेंगे । छह-छह इंच की बाेरिंग करा कर जमीन के अंदर के मीठे पानी से गाड़ी की सफाई हाेती है । एक तरफ लाेग एक-एक बूंद पानी के लिए तरसते हैं ताे दूसरी आेर लाखाें लीटर मीठा पानी गाड़ी सफाई में बर्बाद हाे रहा है । दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां मीठा पानी से गाड़ी धाेना दंडनीय अपराध है । उसके लिए अलग पानी की व्यवस्था हाे । ऐसे छाेटे-छाेटे प्रयासाें से पानी  बचा पायें ताे जीवन बचेगा । लगभग हर व्यक्ति समझ चुका है कि प्रकृति के साथ मजाक करने का नतीजा क्या हाेता है । अब वक्त है इस पर अमल करने की । नहीं माननेवालाें के साथ कड़ाई से पेश आने की । लाेग भी जिम्मेवारी समझें जहां भी माैका मिले,  पेड़ लगायें, पानी बचायें, बारिश के पानी काे राेकने के लिए मिट्टी का स्थान खाली छाेड़ें सरकार भी साेचे कि बरगद-पीपल, ईमली-आम वाले पेड़ाें काे कैसे लगाया जाये ताकि 20-30 साल बाद वे बड़े हाे जायें । फैशनवाले पेड़ लगाने से काेई लाभ नहीं हाेगा । सरकार भी तय करे कि अगर एक पेड़ काटते हैं ताे पांच पेड़ लगाये, खास कर सड़क किनारे । तभी धरती का तापमान कम हाेगा । ऐेसे प्रयास से ही जीवन बच सकता है, वरना आनेवाले दिनाें में एक-एक बूंद पानी के लिए तरसना पड़ेगा ।

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