October 26, 2020

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निजी प्रैक्टिस करनी है, तो रिम्स से इस्तीफा दे दीजिए

रांची : रिम्स निदेशक डॉ दिनेश कुमार सिंह ने सोमवार को रिम्स के आसपास निजी प्रैक्टिस करनेवाले चार डॉक्टरों की निजी क्लिनिक पर छापेमारी की. इस दौरान ये डाॅक्टर मरीजों को परामर्श दे रहे थे. अचानक निदेशक काे क्लिनिक में आते देख सभी डॉक्टर भौचक हो गये. किसी तरह अपने काे संभाला और निदेशक को बैठने का आग्रह किया. निदेशक ने कहा : सोचा कि आज आपकी क्लिनिक में चाय पी जाये.

इसके बाद निदेशक ने डॉक्टरों को स्पष्ट हिदायत दी कि आप लोग बच्चे की तरह हो गये हैं. समझाने पर भी समझ नहीं आता है. अगर आपको निजी प्रैक्टिस करनी ही है, तो रिम्स से इस्तीफा दे दीजिए. सरकार रिम्स के डाॅक्टरों को निजी प्रैक्टिस नहीं करने की हिदायत दे चुकी है. अखबार में विज्ञापन द्वारा इसकी जानकारी प्रकाशित की गयी है. इसके बाद भी आप निजी प्रैक्टिस करने से बाज नहीं आ रहे है.

जब आप निजी प्रैक्टिस की व्यस्था में लगे रहेंगे, तो रिम्स में दूर-दराज से आये गरीब मरीजों को बेहतर सेवा कैसे दें पायेंगे? जानकारी के अनुसार दोपहर 2:30 बजे के करीब निदेशक अपने कार्यालय से निकले और एक-एक करके रिम्स के आसपास स्थित चार क्लिनिकों और नर्सिंग होम में गये. सूत्रों की मानें तो निदेशक  स्कीन, यूरोलॉजी,  सर्जरी, डेंटल  के डॉक्टरों के क्लिनिक पर छापेमारी की है. निदेशक को किसी ने निजी प्रैक्टिस करते हुए इन डॉक्टरों का विडियो क्लिप उपलब्ध कराया था. 

सूत्रों की मानें, तो रिम्स निदेशक ने जिन चार डॉक्टरों के यहां छापेमारी की है, उनकी प्रैक्टिस कम है. लेकिन, रिम्स के कई बड़े डॉक्टर भी निजी प्रैक्टिस करते हैं. वह खुलेआम मरीजों को देखते हैं,  जिसके यहां 40 से 50 मरीज प्रतिदिन परामर्श लेने आते हैं. रिम्स के कई डॉक्टरों ने बताया कि निदेशक महोदय बड़ी मछली को पकड़ ही नहीं रहे हैं.  बड़े डॉक्टरों के निजी प्रैक्टिस पर रोक लग जाये, तो सही मायने में रिम्स का भला हो जायेगा.    

रिम्स निदेशक डॉ दिनेश कुमार सिंह साफ कर चुके हैं कि शुरुआती दो महीनों में वे रिम्स को  समझने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन, अब समय आ गया है कि   ठोस फैसला लिया जाये. इसी कड़ी में वे रविवार रात 10:30 बजे इमरजेंसी पहुंचे. आम आदमी की तरह वे इमरजेंसी में टहलते रहे. कोई जूनियर डॉक्टर उनको पहचान नहीं पा रहा था. करीब एक घंटे रहने के बाद वह  अपने आवास पर चले गये. 

 सोमवार को इस निरीक्षण के बाबत उन्होंने कहा कि इमरजेंसी में जायजा लेने के बाद यह पाया कि पीजी प्रथम और द्वितीय वर्ष के विद्यार्थी मरीजों को परामर्श दे रहे थे. लेकिन इमरजेंसी में मरीजों को जिस तरह इलाज  मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा था. उन्होंने कहा कि जूनियर डॉक्टरों को आते-आते वह कह आये कि मैं आप लाेगों को पैसा उपलब्ध कराता हूं. आपलोग देश के बड़े अस्पताल (रिम्स के समतुल्य) का भ्रमण कीजिए. आपको देख कर ही पता चल जायेगा कि मरीज का इलाज कैसे होता है.

स्वास्थ्य सचिव से लेकर रिम्स के निदेशक तक कह चुके हैं कि अस्पताल में आनेवाले मरीजों को हर हाल में बेड मिलना चाहिए. लेकिन, यहां तो गंभीर रूप से बीमार छोटे-छोटे बच्चों को भी बेड नसीब नहीं हो रहा है. मिसाल के तौर पर सोमवार का ही मामला ले लीजिए. 

बिहार के शेरघाटी निवासी महजबीन परवीन और मनीउर्र रहमान अपनी छह माह की बच्ची का इलाज कराने के लिए रिम्स पहुंचे हुए थे. यहां उसका इलाज न्यूरो सर्जन डॉ अनिल की यूनिट में भर्ती कराया गया है. सुबह नौ बजे से दोपहर के 2:30 बज गये थे, बच्ची को बेड नहीं मिला है. परिजन उसे जमीन पर ही लिटाये हुए थे. बच्ची का राे-रो कर बुरा हाल था.

वहीं माता-पिता बच्ची की सेहत को लेकर काफी परेशान थे. पिता ने बताया कि बच्ची के दिमाग में पानी भरा गया है. बेड न मिलने के बाबत नर्स ने बताया कि वार्ड में जगह नहीं हैं. इधर, बच्ची की स्थिति गंभीर होने के बावजूद दोपहर 2:30 बजे उसे देखने वाले डॉक्टर का भी अता-पता नहीं था.

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